Thursday, 1 August 2013

“ तन्हाई ”

“आज कोई अपना सगा नज़र नहीं आता
हर ग़म सिने में दबे हैं,  जिसे कोई देख नहीं पता
खुदा ने जो दिए रिश्ते, उसकी बेक़द्री की मैंने
जिसकी ये सजा मैंने पाई है, अपने अब सारे बेगाने हैं
बेगाने को अपनी ज़िदगी का हिसाब देना होता है
हर सांस का जवाब देना पड़ता है
न चाह कर भी हर आंसू को दबाना पड़ता है
ये हमारी खताओं की सजा है, जो रो रो कर हँसना पड़ता है ”




“ ख्वाहिश ”

गर जिस दिन बंद कर लूँ आँखें अपनी
शायद तुम समझ पाओ
प्यार दे कर भी हमने क्या पाया
अश्कों में कितना दर्द छुपाया
ज़िन्दगी और रिश्ते को सम्हालती रही
बिना किसी शिकवा के ज़िन्दगी जीती रही
खुदा जिस दिन छीन ले ये हिम्मत ,
 वहीँ रुक जायेंगे ये क़दम
ये धरकते दिल तुम्हारे नाम पे रुक जायेंगे
तब शयद तुम ये रिश्ते समझ पाओ
तब शायद तुम हिना समझ पाओ  





“ रिश्ते ”

जो रिश्ते माँ बाप बनाते हैं उसमे खुदा की मैहर होती है
जो कई दुवाओं और प्यार के बंधन से बंधी होती है
लाख उसे तोडना चाहे ज़माना, उसमे ग़ज़ब सी मज्बुतियाह होती है
रिश्ते की अह्मिअत हम इंसान ना समझ पायें शायद
लेकिन हर उन रिश्तो में खुदा की मसलेहत होती है 




“ ग़ैर ”

कभी कोई अपना पराया हो नहीं सकता
और पराये को लाख अपनाओ वो अपना हो नहीं सकता
लाख प्यार निच्छावर करो वो अपना हो नहीं सकता
कलेजा निकाल भी दो तुम अगर, उसे कलेजे में भी घर्ज नज़र आएगा
बेगाना रिश्ता कभी अपना हो नहीं सकता...




“ दिल की आवाज़ ”

“ इस दिल की बेचैनियों को खुदा कम कर दे
मुझे मेरी ग़लतियों की सजा से बक्श दे
अकेली हूँ मैं , मेरी तनहाइयाँ तो अब वापस ले लो
बस अब मुझे मेरे सर पे एक साया तो दे दो
जिसके गौद में रखकर सर रो सकूँ
बेचैन दिल के दर्द कम कर सकूँ
बस अब सर रखने को कन्धा तो दे दो ”




“ खता ”

खुदा तू तो हर कुच्छ जानता है कहाँ हुई खता मुझ से
फिर तूने क्यों ना रोका मुझे इन खताओं से
आज मैं रोऊँ भी तो आँखों के अश्क कौन पोच्चेगा
पल पल मैं सहमती और घुटती रहती इसे कौन रोकेगा
खता तो हम इंसान से होती है लेकिन रास्ता तो तुही दिखायेगा
अब तो बक्श दे मुझे मेरी खताओं से
मुझे मेरे दिल को चैन दे दे अब इन अश्कों से
रस्ते तो सुने हैं अब अकेला छोर दे इन तनहाइयों से
काश कोई तो देता सर पे हाथ
खुदा तूने तो महरूम कर दिया अब मुझे मेरी माँ के आँचल से !!!!





“ अश्क ”

कतरा कतरा अश्क आँखों से निकलते रहे
सारी रातें हम रफ्ता रफ्ता सोंचते रहे
बारीकियां न मिली उन खातावों की जिसकी सजा मुझे आज तक मिलते रहे
कौन सा था वो पल जहाँ से हम अपनी ज़िन्दगी बिखेरते गए.....