Wednesday, 7 August 2013

जज्बात वो अबला नारी के :

मैं घर की शादो बारिश हूँ जो हर चेहरे पे खुशियाँ लाती
अपने अरमानो ग़म भूलकर गैरों को हसाती

अपना न है कोई ठिकाना, घर छोर बनाती दूसरों का फ़साना
कहने को हूँ जीनत मैं, लेकिन न कोई ठिकाना

अहसास ऐसा जैसे हूँ रहमो करम पे तेरे
कल कभी टूट जायेगा ये गैरों का आशियाँ

हर मुश्किलों में है मुस्कुराना
न जज्बा दिल में पैदा करना, बस दूसरों का घर है बसाना

कब टूट जाये ये बसेरा न मालूम किसी को
गैरों के घर में हैं रौशन करना

कहाँ है कोई वजूद अपना, अरमान अपने
जब तक हैं सांस तब तक हैं एक उम्मीद लगाना

शायद होगा कोई अपना भी वजूद कहीं
तिनके तिनके जोडकर परिंदों की तरह अपना भी है ठिकाना बनाना 





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