Thursday, 1 August 2013

परिंदे....


परिंदों की तरह काश आसमान की बुलंदियों में उड़ पाती 
न होती कोई बंधने ना होती कोई रिश्ते की मर्यादा
कभी उडती तो कभी झूलती, कभी आसमा तो कभी ज़मीं को छूती
बारिशों में खेलती, धान के खेतों में चुगती
ना होती किसी रिश्ते की कर्वाहत ना होती शिकवे
बस ऊँचाइयों को छूने की होड़ में एक दिन दुनिया छोड़ जाती
बस इतनी सी होती ज़िन्दगी, ना किसी की कोई शिकयाते होती



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